त्रेता युग में कैसे मनाई जाती थी होली?

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त्रेता युग में कैसेमनाई जाती थीहोली?

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होली दुनिया के सबसे पुराने त्योहारोंमें से एक है, लेकिन समय के साथ इससेजुड़ी कई परंपराएं बदलती रहीं।

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वैदिक काल में होली का पर्व नवात्रैष्टियज्ञ के तौर पर मनाया जा था, जिसमेंखेत के अधपके अन्न को यज्ञ में डालते थे।

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उन दिनों अन्न को होला कहते थे।इसी वजह से इसका नामहोलिकोत्सव पड़ा।

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भारतीय ज्योतिष के हिसाब से होलीके दिन से ही हिंदु नव वर्ष की शुरुआतहोती है। इसलिए यह पर्व बसंत केआने का प्रतीक भी है।

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माना जाता है कि होली के दिन हीप्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ, जिसकीवजह से इसे मन्वादितिथि कहा जाने लगा।

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त्रेता युग की शुरुआत में होली धुलेंडीके रूप में मनाई जाने लगी। माना जाता हैकि भगवान विष्णु ने धूली का वंदन किया था,जिससे इसका नाम धुलेंडी हो गया।

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धुलेंडी पर्व होली के अगले दिन मनायाजाता है, इसमें लोग एक-दूसरे पर धूलऔर कीचड़ लगाते हैं, इसे धूल कास्नान भी कहा जाता है।

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पुराने जमाने में विवाहित महिलाएंपरिवार की सुख-समृद्धि के लिए होलीमनाती थीं और चांद की पूजाकरती थीं।

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वर्तमान समय तक आते-आते होलीका स्वरूप और भी बदल गया ।अब होली बुराई  पर अच्छाई के रूपमें मनाई जाती है।