साध्वी बनने की कठोर प्रक्रिया

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साध्वी बनने कीकठोर प्रक्रिया

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माघ महीने की पूर्णिमा पर प्रयागराग में गंगा के तट पर सभी 14 अखाड़ों का टेंट लगता है और देशभर से आए लाखों श्रद्धालु गंगा में स्नान करते हैं।

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इन 14 अखाड़ों में एक महिला अखाड़ा भी है, जिसे गायत्री त्रिवेणी प्रयागपीठ के नाम से जाना जाता है। जानिए क्या हैं इस अखाड़े के नियम, महिलाएं कैसे बनती हैं साध्वी।

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इस अखाड़े में सिर्फ महिला साध्वी रहती हैं। प्रतिनिधि से लेकर प्रबंध, संचालन करने वाली सभी महिलाएं हैं।

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इसकी पीठाधीश्वर हैं जगतगुरु शंकराचार्य त्रिकाल भवंता सरस्वती। भवंता सरस्वती खुद को अर्द्धनारीश्वर का रूप बताती हैं।

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9-10 साल पहले इस अखाड़े की नींव रखी गई थी। जब भवंता सरस्वती ने खुद को शंकराचार्य घोषित किया तब दूसरे अखाड़ों का काफी विरोध झेलना पड़ा।

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महिला अखाड़े को भी उसी तरह की मान्यता है, जैसे दूसरे अखाड़ों को। अखाड़े में किसी भी जाति की महिला दीक्षा ले सकती है।

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दीक्षा लेने के लिए महिला को संकल्प लेना होता है। अखाड़े के नियम का पालन करना होता है। एक बार आप साध्वी बन गईं तो आपको ताउम्र भगवा पहनना होगा।

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शराब और मांस से दूर रहना होता है। खाने में भी आप सिर्फ सादा, उबला हुआ खाना खा सकती हैं। साधना करनी पड़ती है।

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संन्यासिन बनने से पहले महिला के घर, परिवार और उनके पिछले जन्म की कुंडली भी खंगाली जाती है। पूरी जांच-पड़ताल होती है।